व्यवहार सम्यक्त्व के 67 बोल :- शुद्धि-3
विकृत श्रद्धा के निराकरण के प्रयत्न को ‘शुद्धि’ कहते हैं।
1. मनशुद्धि- मन से वीतराग देव व सुगुरु का स्मरण, ध्यान और गुणगान करें, अन्य सरागी देव का नहीं करें।
2. वचन-शुद्धि- वाणी से वीतराग देव व सुगुरु का गुणगान करें, अन्य सरागी देव का नहीं करें।
3. काय-शुद्धि- काय से श्री वीतराग देव व सुगुरु को वन्दना-नमस्कार करें, अन्य सरागी देव को नहीं करें।