व्यवहार सम्यक्त्व के 67 बोल
लक्षण - 5
श्रद्धा होने पर जो गुण आवश्यक रूप से पाये जाने चाहिये, वे ‘लक्षण’ कहलाते हैं।
1. सम- अनन्तानुबन्धी कषाय का उदय न होना ‘सम’ है।
2. संवेग- मोक्ष की तीव्र इच्छा ‘संवेग’ है।
3. निर्वेद- संसार से उदासीनता रूप वैराग्य भाव का होना ‘निर्वेद’ है।
4. अनुकम्पा- दुःखी जीवों के दुःखों को मिटाने की इच्छा ‘अनुकम्पा’ है। द्रव्य और भाव के भेद से अनुकम्पा दो प्रकार की है। शक्तिपूर्वक दुःखी जीवों के दुःख दूर करना द्रव्य अनुकम्पा है तथा दुःखी को देखकर दया से हृदय कोमल हो जाना, भाव अनुकम्पा है।
5. आस्था- जिनेन्द्र भगवान के फरमाये हुए सूक्ष्म, गूढ़, अतीन्द्रिय, धर्मास्तिकाय, आत्मा, परलोक आदि पर श्रद्धा करना ‘आस्था’ है।