विद्वानों के अनुसार जैन धर्म की प्राचीनता की सिद्धि

विद्वानों के अनुसार जैन धर्म की प्राचीनता की सिद्धि

विद्वानों के अनुसार जैन धर्म की प्राचीनता की सिद्धि

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विद्वानों के अनुसार जैन धर्म की प्राचीनता की सिद्धि :-

१- जर्मन विद्वान् डॉक्टर जैकोबी इसी मत से सहमत हैं कि ऋषभदेव का समय अब से असंख्यात वर्ष पूर्व का है |

२- श्री हरिसत्य भट्टाचार्य की लिखी - ' भगवान् अरिष्टनेमि ' नामक अंग्रेजी पुस्तक में तीर्थंकर नेमिनाथ को ऐतिहासिक महापुरुष स्वीकार किया गया है |

३- डॉ० विन्सेन्ट ए० स्मिथ के अनुसार मथुरा सम्बन्धी खोज ने जैन परम्पराओं को बहुत बड़ी मात्रा में समर्थन प्रदान किया है | जो जैन धर्म की प्राचीनता और उसकी सार्वभौमिकता के अकाट्य प्रमाण हैं | मथुरा के जैन स्तूप तथा २४ तीर्थंकरों के चिन्ह सहित मूर्तियों की प्राप्ति " ईस्वी सन के प्रारम्भ में भी जैन धर्म था " यह सिद्ध करती है |

४- मद्रास के प्रोफेसर चक्रवर्ती ने " वैदिक साहित्य का तुलनात्मक अध्यन " पुस्तक में यह प्रमाणित क्या है कि " जैन धर्म उतना ही प्राचीन है " जितना कि हिन्दू धर्म प्राचीन है |

५- डॉ राधाकृष्णन ने ' इंडियन फिलॉसिपी ' पृ० २८७ में स्पष्ट लिखा है कि ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी तक लोग तीर्थंकर ऋषभदेव की पूजा किया करते थे |

६- ३० नवम्बर १९०४ को बड़ौदा में श्री लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने व्याख्यान दिया था कि ब्राह्मण धर्म पर जैन धर्म ने अपनी अक्षुण्ण छाप छोड़ी है | " अहिंसा का सिद्धांत जैन धर्म में प्रारम्भ से है | आज ब्राह्मण और सभी हिन्दू लोग मांस भक्षण तथा मदिरापान में जो प्रतिबन्ध लगा रहे हैं, वह जैन धर्म की ही देन और जैन धर्म का ही प्रताप है | यह दया, करूणा और अहिंसा का ऐसा प्रचार-प्रसार करने वाला जैन धर्म चिरकाल तक स्थाई रहेगा |

७- डॉ० कालिदास नाग ने अपनी पुस्तक ' डिस्कवरी ऑफ़ एशिया ' में जो नग्न-मूर्ति का चित्र प्रकाशित किया था वह दस हजार वर्ष पुराना है | उसे डॉक्टर साहब ने जैन मूर्ति के अनुरूप माना है |

८- श्री चितसंग ने ' उपाय ह्रदय शास्त्र ' में भगवान् ऋषभदेव के सिद्धांतो का विवेचन चीनी भाषा में किया है | चीनी भाषा के विद्वानो को भगवान् ऋषभदेव के व्यक्तित्व और धर्म ने बहुत प्रभावित किया है |

९- इटली के प्रो० ज्योसेफ टक्सी को एक तीर्थंकर की मूर्ति तिब्बत में मिली थी, जिसे वे रोम ले गये थे | इस कथन से स्पष्ट होता है कि कभी तिब्बत में भी जैनधर्म प्रचलित था |

१०- यूनानी लेखकों के कथन से यह सिद्ध होता है कि पायथागोरस डायजिनेश जैसे यूनानी तत्ववेत्ताओं ने भारत में आकर ' जैन श्रमणों ' से शिक्षा, दीक्षा ( नियम ) ग्रहण की थी | यूनानी बादशाह सिकंदर के साथ धर्म प्रचार के लिए कल्याण मुनि उनके देश में गए थे |

११- जापान के प्रसिद्द पुरातत्ववेत्ता प्रो० हाजिमे नाकामुरा लिखते हैं कि बौद्ध धार्मिक ग्रंथों के चीनी भाषा में जो रूपांतरित संस्करण उपलब्ध है, उनमे यत्र तत्र जैनों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के विषय में उल्लेख मिलते हैं, तीर्थंकर ऋषभदेव के व्यक्तित्व से जापानी भी अपरिचित नहीं हैं | जापानी तीर्थंकर ऋषभदेव को " राकूशव " कहकर पहचानते हैं |

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