गजसुकुमार-अनुपम क्षमा

गजसुकुमार - अनुपम क्षमा

गजसुकुमार-अनुपम क्षमा

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गजसुकुमार - अनुपम क्षमा

गजसुकुमार का दृष्टांत

कृष्ण वासुदेव के गजसुकुमार नाम के छोटे भाई महा सुरूपवान एवं सुकुमार मात्र बारह वर्ष की आयु में भगवान नेमिनाथ के पास संसार त्यागी होकर श्मशान में उग्र ध्यान में स्थित थे; तब वे एक अद्भुत क्षमा मय चरित्र से महासिद्धि को पा गये।

सोमल नाम के ब्राह्मण की सुरूप वर्ण संपन्न पुत्री के साथ गजसुकुमार की सगाई हुई थी। परंतु विवाह होने से पहले गजसुकुमार तो संसार त्याग कर चले गये । इसलिये अपनी पुत्री के सुख नाश के द्वेष से उस सोमल ब्राह्मण को भयंकर क्रोध व्याप्त हो गया। गजसुकुमार की खोज करता करता वह उस श्मशान में आ पहुँचा जहाँ महा मुनि गजसुकुमार एकाग्र विशुद्ध भाव से कायोत्सर्ग में थे। उसने कोमल गजसुकुमार के माथे पर चिकनी मिट्टी की बाड बनाई और उसके अंदर धधकते हुए अंगारे भरे और ईंधन भरा जिससे महा ताप उत्पन्न हुआ। इससे गजसुकुमार की कोमल देह जलने लगी तब सोमल वहाँ से जाता रहा। उस समय गजसुकुमारके असह्य दुःख के बारे में भला क्या कहा जाये? परंतु तब वे सम भाव परिणाम में रहे। किंचित् क्रोध या द्वेष उनके हृदयमें उत्पन्न नहीं हुआ। अपने आत्मा को स्वरूपस्थित करके बोध दिया, "देख! यदि तूने इसकी पुत्री के साथ विवाह किया होता तो यह कन्यादान में तुझे पगडी देता। वह पगडी थोडे समय में फट जाने वाली तथा परिणाम में दुःखदायक होती। यह इसका बडा उपकार हुआ कि उस पगडी के बदले इसने मोक्ष की पगडी बँधवायी।" ऐसे विशुद्ध परिणामों से अडिग रहकर समभाव से उस असह्य वेदना को सहकर, सर्वज्ञ सर्वदर्शी होकर वे अनंत जीवन सुख को प्राप्त हुए। कैसी अनुपम क्षमा और कैसा उसका सुन्दर परिणाम ! तत्त्वज्ञानियों के वचन हैं कि आत्मा मात्र स्व सदभाव में आना चाहिये, और वह उसमें आया तो मोक्ष हथेली में ही है। गजसुकुमार की प्रसिद्ध क्षमा कैसा विशुद्ध बोध देती है!

श्रीमद राजचंद्र प्रणीत
दृष्टांत कथा
हिंदी अनुवादक - श्री हंसराज जी जैन
किताब प्रकाशक -श्रीमद राजचंद्र जन्म भवन ववाणिया

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