पच्चीस बोल-ग्यारहवें बोले गुणस्थान चौदह

मोह और योग के निमित्त से आत्म-विकास की बनने वाली तरतम (कम-ज्यादा) अवस्थाओं को गुणस्थान कहते हैं। मोह और योग के निमित्त से सम्यग्ज्ञान, सम्यगदर्शन और सम्यगचारित्र रूप आत्मा के गुणों की तारतम्य (न्यूनाधिकता)रूप अवस्था विशेष को 'गुणस्थान कहते हैं। जीव के ज्ञान-दर्शन-चारित्र आदि आत्मिक गुणों की न्यूनाधिक अवस्था को 'गुणस्थान' कहते हैं।

पच्चीस बोल-ग्यारहवें बोले गुणस्थान चौदह

post

पच्चीस बोल - ग्यारहवें बोले गुणस्थान चौदह

ग्यारहवें बोले गुणस्थान चौदह - 1. मिथ्यात्व गुणस्थान, 2. सास्वादन गुणस्थान, 3. मिश्र गुणस्थान, 4. अविरति सम्यग्दृष्टि गुणस्थान, 5. देशविरति श्रावक गुणस्थान, 6. प्रमादी साधु गुणस्थान, 7. अप्रमादी साधु गुणस्थान, 8. निवृत्ति बादर गुणस्थान, 9. अनिवृति-बादर गुणस्थान, 10. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान, 11. उपशान्त मोहनीय गुणस्थान, 12. क्षीण मोहनीय गुणस्थान, 13. सयोगी केवली गुणस्थान और 14. अयोगी केवली गुणस्थान।
आधार-समवायांग-14

गुणस्थान

मोह और योग के निमित्त से आत्म-विकास की बनने वाली तरतम (कम-ज्यादा) अवस्थाओं को गुणस्थान कहते हैं।

मोह और योग के निमित्त से सम्यग्ज्ञान, सम्बग्दर्शन और सम्बकचारित्र रूप आत्मा के गुणों की तारतम्य (न्यूनाधिकता)रूप अवस्था विशेष को 'गुणस्थान कहते हैं।

जीव के ज्ञान-दर्शन-चारित्र आदि आत्मिक गुणों की न्यूनाधिक अवस्था को 'गुणस्थान' कहते हैं।

जीव की अशुद्धतम दशा से लेकर शुद्धतम दशा तक, संसारी अवस्था से सिद्ध अवस्था तक की अवस्थाएँ इन चौदह गुणस्थानों में वर्णित हैं :-

1. मिथ्यात्व गुणस्थान- देव, गुरू, धर्म और अपने आत्म-स्वरूप के बारे में यथार्थ श्रद्धान नहीं होना अर्थात् विपरीत श्रद्धान होना 'मिथ्यात्व गुणस्थान' है। जब तक जीव में मिथ्यात्व रहता है, तब तक जीव का अनन्त संसार का बंध चलता रहता है। इसके सद्भाव में की गयी धार्मिक क्रियाएँ कर्म-निर्जरा का हेतु नहीं बनकर केवल पुण्य-बंध का हेतु बनती है। धर्म की शुरूआत ही मिथ्यात्व के चले जाने पर सही रूप में होती है। इसलिए व्यक्ति को मिथ्यात्व रूपी महाभयंकर शत्रु से सदैव बचने का और दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जब तक अपने शुद्ध आत्म-स्वरूप का भान नहीं हो जाता, तब तक वह मिथ्यात्व गुणस्थान में ही रहता है। मिथ्यात्वी भी कई प्रकार के हो सकते हैं, जैसे1. अभवी- जो अनादि काल से मिथ्यात्वी हैं और अनन्त काल तक मिथ्यात्वी ही रहकर इस चतुर्गतिरूप संसार में परिभ्रमण करते रहेंगे। इनमें मुक्ति पाने की योग्यता ही नहीं होती है। 2. भवी-जो अनादिकाल से मिथ्यात्वी हैं, किन्तु सम्यक् पुरुषार्थ कर मिथ्यात्व का अन्त कर मोक्ष प्राप्ति की योग्यता रखते हैं। 3. पडिवाई-जिन जीवों ने एक बार सम्यक्त्व प्राप्त कर लिया है, किन्तु सम्यक्त्व का वमन कर देने से वर्तमानमिथ्यात्व दशा में है।

2. सास्वादन गुणस्थान- उपशम सम्यक्त्वी के अनन्तानुबन्धी कषाय का उदय होने से व दर्शन मोहनीय का उपशम कायम रहने से सम्यक्त्व की आस्वाद मात्र जो अवस्था बनती है, उसे सास्वादन गुणस्थान कहते हैं। उपशम समकित के लाभ को जो बाधा पहुंचाए, विराधना करे, उसे भी सासादन गुणस्थान कहते हैं। इसी कारण से इस गुणस्थान को सासादन गुणस्थान के नाम से भी जाना जाता है। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य एक समय, उत्कृष्ट छह आवलिका की होती है। इसमें जीव वमन किये सम्यक्त्व का आस्वाद मात्र लेता रहता है। इसी मध्यवर्ती (सम्यक्त्व से मिथ्यात्व में आने के बीच की अवस्था) पतनोन्मुख दशा का नाम सास्वादन गुणस्थान है। जैसे खीर खाकर वमन करने पर खीर का हल्का सास्वाद मुंह में बना रहता है।

3. मिश्र गुणस्थान - जब जीव देव, गुरु, धर्म तथा अपने स्वरूप के बारे में सही निर्णय (श्रद्धान) नहीं कर पाता है, कुदेव और सुदेव की मान्यता में अन्तर नहीं कर पाता है, तब सम्यक्त्व एवं मिथ्यात्व से मिश्रित इस अवस्था को 'मिश्र मोहनीय गणस्थान' कहते हैं। इस गुणस्थान में मिश्र मोहनीय प्रकति का उदय होता है, जिसके कारण जीव को जैन धर्म में न तो एकान्त प्रीति होती है और न एकान्त अप्रीति । इसमें न तो आगामी भव का आयुष्य बन्धाता है, न ही जीव काल करता है, न ही किसी लब्ठिा का प्रयोग करता है। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य, उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त होती है।

4. अविरति सम्यग्दृष्टि गुणस्थान- दर्शन मोहनीय कर्म की तीन (मिथ्यात्व, मिश्र और सम्यक्त्व मोहनीय) तथा चारित्र मोहनीय की चार (अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ) इन सात प्रकृतियों का उपशम, क्षय या क्षयोपशम करके जीव सम्यग्दृष्टि बनता है। उसे अपने यथार्था स्वरूप का भान हो जाता है। जब जीव गदद्रव्य और नवतत्त्वों का अथवा देव, गुरू, धर्म और अपने आत्म-स्वरूप का परिपूर्ण यशार्श श्रद्धान कर लेता है, परन्तु अप्रत्याख्यानी कषाय का उदय होने के कारण किसी भी प्रकार का व्रत-नियम पालन नहीं कर पाता है। उस अवस्था को 'अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान' कहते हैं। यह गुणस्थान चारों गतियों के संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों में पाया जाता है। विरति या त्याग के अभाव से इसे अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान कहते हैं, किन्तु जिसकी दृष्टि यथार्थ हो गयी, एक दिन वह चारित्र मोह का क्रमशः क्षय करके त्याग-प्रत्याख्यान भी कर सकता है। दृष्टि का यथार्थ होना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। एक बार सम्यक्त्व प्राप्त होने के बाद यदि सम्यक्त्व चली भी जाये तो जीव देशोन (कुछ कम) अर्द्ध पुद्गल परावर्तन काल से अधिक संसार में परिभ्रमण नहीं करता है।

5. देशविरति श्रावक गुणस्थान - जो सम्यग्दृष्टि जीव यथाशक्ति व्रत-नियम जैसे-अहिंसा, सत्य, अचौर्य आदि ग्रहण कर उनकी परिपालना करते हैं, उस अवस्था को देशविरति श्रावक गुणस्थान' कहते हैं। यह गुणस्थान जीव के दर्शन सप्तक के क्षय, उपशम, क्षयोपशम होने पर तथा अप्रत्याख्यानी कषाय चतुष्क के क्षयोपशम होने पर प्राप्त होता है। इसके अभाव में त्याग करने की प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती। इस अवस्था में श्रावक बारह व्रत, चौदह नियम आदि ग्रहण कर अपने जीवन की वृत्ति एवं प्रवृत्तियों को मर्यादित करता है। इस गुणस्थान में आने पर जीव अल्पारम्भी-अल्पपरिग्रही बन जाता है। उसका लक्ष्य अनारम्भी बनना होता है। यह गुणस्थान विरति मार्ग की प्रथम सीढ़ी है। इस गुणस्थान में आंशिकरूप से पापों का त्याग होने के कारण इसे देशविरति श्रावक गुणस्थान कहा है। इसकी स्थिति जघन्य अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट देशोन (कुछ कम) करोड़ पूर्व है। इस गुणस्थान का आराधक जीव जघन्य तीसरे तथा उत्कृष्ट 15 भवों में मोक्ष जाता है।

6. प्रमादी साधुगुणस्थान - जब साधक 18 पापों का अथवा आश्रवों का तीन करण, तीन योग से जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करके संयमी बन जाता है। पाँच महाव्रत, पाँच समिति, तीन गुप्ति इन तेरह प्रकार के चारित्र का पालन करता है। पालन करते हुए भी संज्वलन कषाय की तीव्रता के कारण प्रमाद शेष रह जाता है। अतः 'प्रमादी साधु गुणस्थान' कहलाता है। अपने आत्मस्वरूप का लगातार स्मरण नहीं रहना, ज्ञान, दर्शन, चारित्र की आराधना में अपूर्व आत्मिक उत्साह नहीं होना 'प्रमाद' कहलाता है। प्रमाद पाँच प्रकार का है-मद्द, विषय, कषाय, निद्रा और विकथा। इस गुणस्थान में अरिहंत भगवन्तों की आज्ञानुसार श्रद्धा-प्ररूपणा होने के साथ उनकी पालना भी की जाती है। गृहस्थ समाज के लिए साधु' आदर्श होते हैं। उनके द्वारा की गयी श्रद्धना, प्ररूपणा एवं फरसना के अनुरूप ही गृहस्थों में संस्कार पड़ते हैं। साधु स्व-पर हितकारी होते हैं। अपनी आत्मा का कल्याण करते हुए उपदेश आदि से अन्य लोगों को भी सन्मार्गगामी बनाते हैं। इस गुणस्थान का आराधक जीव जघन्य उसी भव में, उत्कृष्ट 15 भवों में मोक्ष जाता है।

7. अप्रमादी साधु गुणस्थान- जब साधु-साध्वी स्वाध्याय-ध्यान, चिन्तन-मनन आदि में विशेषरूप से लीन हो जाते हैं, पाँच प्रमाद से रहित होकर तेरह प्रकार के चारित्र का निरतिचार पालन करते हैं, अपने आत्म-स्वरूप में रमण करने लग जाते हैं, तब उस अवस्था को अप्रमादी साधु गुणस्थान' कहते हैं। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य एक समय तथा उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त होती है। इस गुणस्थान का आराधक जीव भी जघन्य उसी भव में, उत्कृष्ट 15 भवों में मोक्ष जाता है। छठे व सातवें इन दोनों गुणस्थानों की मिलाकर स्थिति देशोन क्रोड पूर्व की हो सकती है। अलग-अलग तो अन्तर्मुहूर्त से अधिक नहीं होती।

8. निवृत्ति बादर गुणस्थान - निवृत्ति का अर्श है-भिन्नता और बादर का अर्थ है- स्थूल कषाय। इस गुणस्थान में समान समय वाले जीवों के परिणामों में अन्तर होता है तथा स्थूल संज्वलन कषाय का उदय रहता है, इसलिए इसे 'निवृत्ति-बादर गुणस्थान' कहते हैं। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य एक समय तथा उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त होती है। इस गुणस्थान में पांच बातें अपूर्व होने के कारण इस गुणस्थान को अपूर्वकरण गुणस्थान भी कहते हैं। पाँच बातें- 1. स्थिति घात, 2. रस घात, 3. गुण श्रेणि, 4. गुण संक्रमण और 5. अपूर्व स्थिति बन्ध। इस गुणस्थान में जीव उपशम या क्षपक श्रेणि प्रारम्भ करता है।
1. उपशम श्रेणि - दर्शन सप्तक के क्षय या उपशम करने के बाद मोहनीय कर्म की शेष 21 प्रकृतियों को दबाते हुए अर्थात् उपशमन करते हुए आगे के गुणस्थान में बढ़ना'उपशम श्रेणि' है।
2. क्षपक श्रेणि- दर्शन सप्तक के क्षय के बाद मोहकर्म की शेष 21 प्रकृतियों का क्षय करते हुए आगे के गुणस्थानों में बढ़ते हैं तो उसे 'क्षपक श्रेणि' कहते हैं। क्षपक श्रेणि वाले जीव दसवें गुणस्थान से सीधे बारहवें गुणस्थान में होते हुए तेरहवें गुणस्थान में जाकर केवली बन जाते हैं।
इस सम्बन्ध में यह ज्ञातव्य है कि सीधा मोक्ष-मार्ग क्षपक श्रेणि है न कि उपशम श्रेणि। क्षपक श्रेणि वाला जीव चढ़ने के बाद गिरता ही नहीं है, इसलिए यह श्रेणि जीवन में एक बार ही होती है।

9. अनिवृत्ति बादर गुणस्थान - अनिवृत्ति का अर्थ है- अभिन्नता। इस गुणस्थान के सम-समयवर्ती जीवों के परिणामों में समानता होती है तथा स्थूल संचलन कषाय का उदय रहता है, इसलिए इस गुणस्थान को 'अनिवृत्ति-बादर गुणस्थान' कहते हैं। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य एक समय और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त होती है।

10. सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान- सूक्ष्म संज्वलन लोभ का उदय शेष रह जाता है, बाकी प्रकृतियों का क्षय अथवा उपशम हो जाता है, उस अवस्था को सूक्ष्म सम्पराय गुणस्थान' कहते हैं। इस गुणस्थान में सूक्ष्म संपराय चारित्र होता है। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य एक समय और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त है। इस गुणस्थान में जीव की प्रवृत्ति चार ज्ञान में ही रहती है अर्थात् साकार उपयोग में ही प्रवृत्ति रहती है, अनाकार उपयोग में नहीं रहती।

11. उपशान्त मोहनीय गुणस्थान- जब आत्मा में मोहकर्म बिल्कुल शान्त हो जाता है, अर्थात् किसी भी प्रकार से मोहकर्म की किसी भी प्रकृति का उदय नहीं रहता, अन्तर्मुहूर्त के लिए दब जाता है, उस अवस्था को 'उपशान्त मोहनीय गुणस्थान' कहते हैं। इस गुणस्थान में उपशम श्रेणि वाला जीव ही आता है, क्षपक श्रेणि वाला नहीं। क्षपक श्रेणि वाला जीव दसवें गुणस्थान से सीधा बारहवें गुणस्थान में चला जाता है। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य एक समय, उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त होती है। इस गुणस्थान में काल करने वाला जीव अनुत्तर विमान में ही जाता है। यदि काल नहीं करता है तो स्थिति पूरी होने से नियमा नीचे गिरता है। लौटकर जीव दसवें गुणस्थान में, नौवें गुणस्थान में यावत् कोई पहले गुणस्थान में भी आ सकता है। कोई दूसरी बार भी उपशम श्रेणि कर सकता है, आगमानुसार उस भव में क्षपक श्रेणि नहीं कर सकता।

12. क्षीण मोहनीय गुणस्थान - जब मोहनीय कर्म का सर्वथा क्षय हो जाता है. उस अवस्था को 'क्षीण मोहनीय गुणस्थान' कहते हैं। इस अवस्था को पहुँचने पर जीव आगे जाकर निश्चित रूप से केवलज्ञान को प्राप्त करता है, गिरता नहीं है, क्योंकि नीचे के गुणस्थानों में गिरने का कारण मोहकर्म, सर्वथा नष्ट हो चुका होता है। इसकी स्थिति जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त की होती है। इस गुणस्थान के अन्तिम समय में ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय, इन तीनों घाति कर्मों का एक साथ सम्पूर्ण क्षय हो जाता है।

13. सयोगी केवली गुणस्थान - घाति-कर्मों के क्षय से केवलज्ञान, केवलदर्शन की प्राप्ति के साथ यह गुणस्थान प्राप्त होता है। इसमें मन, वचन व काया की प्रवृत्ति चालू रहती है। भाव तीर्शकर का पद भी इसी गुणस्थान में प्राप्त होता है। तीर्थंकर द्वारा प्ररूपित सत्य मार्ग संसारी छदमस्थ जीवों के लिए कल्याणकारी होता है। उस मार्ग के अनुसार आचरण करने से आत्मा शाश्वत सुख एवं शान्ति को प्राप्त कर सकता है। इस गुणस्थान की स्थिति जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट देशोन (कुछ कम) क्रोड़ पूर्व की होती है।

14. अयोगी केवली गुणस्थान - तेरहवें गुणस्थान के अन्त में जब मन, वचन और काय योग का क्रमशः पूर्णतया निरोध हो जाता है, तब उस अवस्था को अयोगी केवली गुणस्थान' कहा जाता है। यहाँ से जीव सभी कर्मों से मुक्त होकर एक समय की अविग्रह-गति से मोक्ष चला जाता है। इस गुणस्थान की स्थिति पाँच लघु अक्षर-अ,इ,ऊ,ऋ ल्र का मध्यम रीति से उच्चारण करने में जितना समय लगे, उतनी होती है।

You might also like!