संगम के उपसर्ग
दृढ़भूमि नगर के बाहर 'पोलास' नामक चैत्य में ‘पोढाल’ नाम उद्यान था। वहाँ अष्टम तप कर भगवान महावीर ने देह को थोड़ा-सा झुकाया और एक पुद्गल पर दृष्टि केन्द्रित कर ध्यानस्थ हो गये। देव-देवियों के विशाल समूह में बैठे हुए देवराज इन्द्र ने अवधिज्ञान से भगवान को ध्यानस्थ देखा और नमस्कार कर बोला बर्द्धमान महावीर का साहस और धैर्य इतना अनूठा है कि मानव तो क्या, देव और दानव भी उनको साधना से विचलित नहीं कर सकते।
सभी देवेन्द्र की बात से हर्षित हुए, किन्तु संगम नामक एक देव भगवान को साधना से विचलित करने के उद्देश्य से भगवान के समीप आया और उसने भगवान की साधना भंग करने के लिए एक से एक बढ़कर उपसर्गों का जाल बिछा दिया। पहले शरीर के रोम-रोम में वेदना उत्पन्न की प्रलयकारी धूल की वर्षा की, चींटी, बिच्छू और साँप आदि से शरीर को कष्ट पहुँचाए, पर जब भगवान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो उसने अनुकूल उपसर्ग उत्पन्न किये। प्रलोभन के मनमोहक दृश्य उपस्थित किये, करुणोत्पादक दृश्यों से मन को विचलित करने की कोशिश की, पर भगवान सुमेरु की तरह ध्यान में स्थिर और अचल रहे। संगम ने एक रात में विभिन्न प्रकार के बीस असहनीय उपसर्ग उपस्थित किये यहाँ तक कि भगवान के माता-पिता, सिद्धार्थ और त्रिशला को करण विलाप करते दिखाया, सुन्दर अप्सराओं द्वारा मन को लुभाने की कोशिश की और देव के रूप में उपस्थित हो स्वर्ग अथवा अपवर्ग (मोक्ष) का प्रलोभन भी दिया। अन्त में असफल हो संगम भगवान को विचलित करने के अन्य उपाय सोचने लगा।
भगवान वहाँ से अपना ध्यानपूर्ण कर 'बालुका' की ओर पधारे। बालुका से वे सुयोग, सुच्छेता, मलभ और हस्तीशीर्ष आदि स्थानो में पधारे। संगम सभी जगह अपने उपद्रवी होने का परिचय देता रहा ।
'तोसलि ग्राम' व 'मोसलि ग्राम' में वह साधुवेश बनाकर चोरी करता व पकड़े जाने पर भगवान को अपना गुरु बताकर सारा दोषारोपण उन पर कर देता। तोसलि ग्राम में महाभूतिल ऐन्द्रजालिक ने व मोसलि ग्राम में सुमागध नामक प्रान्ताधिकारी ने प्रभु का परिचय देकर लोगों से उन्हें छुड़ाया।
एक बार पुन: तोसलि आने पर उसने कुछ शस्त्रास्त्र चोरी किये और उन्हें ध्यान में लीन भगवान के पास छिपा दिये और फिर चोरी करने के लिए गया, जहाँ पकड़ा गया। पकड़े जाने पर उसने अपने गुरु पर सारा दोष मढ़ा। भगवान शस्त्रास्त्र के साथ पकड़े गये तो उन्हें राज्य की ओर से फाँसी की सजा सुनाई गई। जब प्रभु को फाँसी देने की कोशिश की जाती तो गले का फंदा टूट जाता। अन्त में अधिकारियों ने भगवान को महापुरुष समझ छोड़ दिया। सिद्धार्थपुर में भी संगम ने इसी प्रकार चोरी का आरोप लगा कर उन्हें पकड़वाया, जहाँ अश्व व्यापारी ने भगवान को मुक्त कराया।
व्रजगाँव पधारने पर वहाँ महोत्सव होने से सभी घरों में खीर बनी थी, भगवान जहाँ भी भिक्षा के लिए पधारे, संगम ने सर्वत्र 'अनेषणा कर दी। संगमकृत उपसर्ग समझकर भगवान लौट आये और ग्राम के बाहर ध्यानस्थ हो गये। इस प्रकार छः माह तक संगम ने लगातार भगवान को अगणित कष्ट दिये पर भगवान अपनी साधना से विचलित नहीं हुए।
संगम का धैर्य टूट गया और हताश हो वह भगवान के पास आया और बोला- 'भगवन्! देवेन्द्र ने आपके बारे में जो कहा है, वह सत्य है। आप अपनी प्रतिज्ञा में दृढ़ हैं। मेरे अपराध क्षमा करें। अब आप भिक्षार्थ जायें, कोई उपसर्ग नहीं होगा।' भगवान ने कहा- 'मैं स्वेच्छा से तप या भिक्षा ग्रहण करता है। मुझे किसी के आश्वासन की अपेक्षा नहीं है'। दूसरे दिन छ: मास की तपस्या पूर्णकर भगवान उसी गाँव में 'वस्सपालक' नामक बुढ़िया के यहाँ गये और परमान्न से पारणा किया। दान की महिमा से पंचदिव्य प्रकट हुए। यह भगवान की यह दीर्घकालीन उपसर्ग सहित तपस्या थी।