।। अच्छंदा जे न भुंजंति, न से चाइ त्ति वुच्चई ।।
जो पराधीन होने से भोग नहीं कर पाते, उन्हें त्यागी नहीं कहा जा सकता कल्पना कीजिये – दो व्यक्तियों के पास सौ-सौ रुपये हैं। एक उनमें से पचास रुपयों का दान कर देता है और दूसरे व्यक्ति के पचास रुपये कहीं खो जाते हैं। इस प्रकार दोनों के पास बराबर पचास-पचास रुपये ही बचे रहते हैं; फिर भी हम पहले व्यक्ति को ही त्यागी कहेंगे, दूसरे को नहीं। ऐसा क्यों! इसलिए कि पहले व्यक्ति ने स्वेच्छा से त्याग किया है; दूसरे का त्याग विवशता से हुआ है। एक और उदाहरण लीजिये। एक आदमी के पास भोजन सामग्री खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं और दूसरे के पास मिठाई खरीदने योग्य भरपूर पैसे हैं। पर उसने उपवास कर रखा है। भूखे दोनों है; फिर भी पहला व्यक्ति विवशता से भूखा है और दूसरा स्वेच्छासे; इसलिए दूसरा व्यक्ति ही त्यागी कहलायेगा, पहला नहीं। इन दो उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि जो व्यक्ति स्वेच्छा से विषयभोगों का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी है। भोग-सामग्री न मिलने के कारण जो भोग नहीं करता, उसे त्यागी नहीं कहा जा सकता।
- दशवैकालिक सूत्र 2/2